
संघ के सभी सहयोगी संगठनों की समन्वय समिति- जिसमें भाजपा भी शामिल है- की तीन दिवसीय बैठक जोधपुर में शुरू हो चुकी है। इसका मकसद भविष्य की रणनीति बनाना और मोहन भागवत द्वारा एक व्यापक वर्ग तक पहुंचने की कोशिशों के बाद उभरती हुई स्थिति का आकलन करना है।
भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी इसमें शामिल हो रहे हैं। संघ के 100 साल पूरे होने के मौके पर विज्ञान भवन में हाल ही में हुई तीन दिवसीय व्याख्यान शृंखला में संघ ने अपनी छवि बदलने और अपने आलोचकों से भी सम्पर्क करने की कोशिश की थी।
इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि संघ का अगला चरण एक बड़ा आउटरीच कार्यक्रम होगा- ताकि अधिक से अधिक लोग उसे स्वीकार करें। भागवत की 240 मिनट से अधिक समय तक चली व्याख्यान शृंखला से तीन मुख्य बातें सामने आई हैं।
पहली बात यह थी कि इन व्याख्यानों ने भागवत और नरेंद्र मोदी- जो जल्द ही 75 साल के होने वाले हैं- की सार्वजनिक जीवन में सक्रियता सम्बंधी अटकलों को खत्म कर दिया। भागवत के शब्दों से साफ हुआ कि 2029 के चुनाव में भी मोदी ही पार्टी का नेतृत्व करेंगे।
भागवत ने संघ और भाजपा के बीच के संबंधों को यह कहते हुए स्पष्ट करने की कोशिश की कि संघ प्रमुख के तौर पर उनका काम शाखाएं चलाना और स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित करना है, जबकि भाजपा का काम देश का कामकाज चलाना है और वे सिर्फ तभी परामर्श देंगे, जब उनसे पूछा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर भाजपा के नए अध्यक्ष का चुनाव संघ को सौंपा जाता, तो वह अब तक यह कर चुका होता।
लेकिन सच तो यह है कि संघ और भाजपा एक-दूसरे के बिना संचालित नहीं हो सकते और यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि भाजपा का नया अध्यक्ष संघ की राय के बिना चुना जाएगा- भले ही नड्डा ने पिछले साल कहा हो कि भाजपा को अब संघ की मदद की जरूरत नहीं।
2024 के चुनाव परिणामों से पता चला था कि चुनाव के समय संघ के पीछे रहने का क्या असर होता है। उसके बाद हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली के चुनाव परिणामों से यह भी पता चला कि जब संघ के स्वयंसेवक जमीन पर भाजपा के लिए सक्रिय होकर प्रचार करते हैं तो उसे कितनी बड़ी जीत मिलती है।
पिछले सरसंघचालकों के विपरीत भागवत एक शक्तिशाली और लोकप्रिय प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली भाजपा के साथ काम कर रहे हैं। इससे कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। उनके व्याख्यानों की दूसरी बड़ी बात यह थी कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय तक पहुंच बनाने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा कि मुसलमान भारत के अपने और हमारा हिस्सा हैं। उन्होंने यह भी कहा कि चाहे आप हिंदू, हिन्दवी, भारतीयता या सनातन कहें, ये सब एक ही बात है। भागवत ने यह भी कहा कि संघ अयोध्या जैसे किसी आंदोलन में हिस्सा नहीं लेगा, हालांकि स्वयंसेवक चाहें तो ऐसा कर सकते हैं। इससे पहले भी भागवत ने हिंदुओं को हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजने से मना किया था।
पिछले कुछ सालों में भागवत ने मुस्लिम समाज के प्रतिष्ठित लोगों के साथ कई बार बातचीत की है, ताकि एक-दूसरे की स्थिति को बेहतर ढंग से समझा जा सके। और उम्मीद है कि इस तरह की वार्ताएं आगे भी जारी रहेंगी।
भागवत के व्याख्यानों की तीसरी बड़ी बात तीन बच्चों के नियम को बढ़ावा देने के बारे में थी। उन्होंने ‘हम दो हमारे तीन’ का नारा दिया। यकीनन, यह हिंदुओं की संख्या बढ़ाने के लिए नहीं हो सकता, क्योंकि यह नियम मुसलमानों पर भी लागू होगा।
आज जब दुनिया के कई देशों की आबादी बुजुर्ग होती जा रही है, तो युवा आबादी का विचार आकर्षक लग सकता है। लेकिन सभी को अच्छी शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य सुनिश्चित किए बिना जनसांख्यिकीय लाभ या डेमोग्राफिक डिविडेंड दूर की बात रहेगी। फिर तीन बच्चों का नियम महिलाओं की पसंद के अधिकार से भी जुड़ा है।
फिर भी भागवत ने महिलाओं तक उस तरह से पहुंच बनाने का प्रयास नहीं किया, जैसा कि कई लोगों को लगा था। उनसे महिलाओं की बड़ी भूमिका के बारे में कई सवाल पूछे गए। उन्होंने इतना भर कहा कि संघ में महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं और राष्ट्र सेविका संघ तो 1936 से ही सक्रिय है।
महिलाएं शाखाओं का हिस्सा नहीं हैं। आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, वे अब सिर्फ सहायक भूमिका निभाने को तैयार नहीं हैं। आज हर राजनीतिक पार्टी महिलाओं को लुभाने के लिए कोशिशें कर रही है। वे शायद आज देश में सबसे महत्वाकांक्षी समूह हैं। उनकी क्षमता का सही इस्तेमाल किया जाए तो वे एक परिवर्तनकारी शक्ति बन सकती हैं।
संघ के 100 साल पूरे होने पर विज्ञान भवन में हुई व्याख्यान शृंखला में संघ ने छवि बदलने और आलोचकों से भी सम्पर्क करने की कोशिश की थी। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि संघ का अगला चरण एक बड़ा आउटरीच कार्यक्रम होगा। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

