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मेरा मोहल्ला : सुजीत सिंघल

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(कल फेसबुक पर एक सफल उद्धमी अपनी आप बीती बता रहे थे कि कैसे वो और उसके साथी लड़कपन में चोर थे। एक मकान की रेकी के दौरान जो घटनाएं पेश आई उसके बाद उन्होंने तय किया कि भीख मांग कर खा लेंगे पर चोरी नही करेंगे। हालांकि ये नौबत नहीं आई और छोटे बड़े काम करके सफल व्यवसायी बन गए। वो लिखते हैं- हालांकि एक दो बार बेईमानी का ख्याल आया पर उसी समय उनके पैरों में बायंठे आ जाते और कोहनी के गट्टे सूज जाते। कालर बोन दर्द की बारिश कर देती। लिहाजा कभी बेइमानी का सोचा तक नही-
इसी को पढ़कर कुछ अपने हिसाब से लिख दिया)

माताजी – चों बे तुम तीनों नेक इधर अइयो

आदमी – जी माताजी.. आए

माताजी – तीन दिन से देख रही हूँ तुम तीनों मोहल्ले में घूम रहे हो..चोर वोर तो नही हो

आदमी – अजी नहीं माताजी..
दूसरा – जी हम तो गाड़ी पे चलते हैं
तीसरा – आपको शकल से हम चोर दिखाई दे रहे हैं?

माताजी – शकल से तो नही लगते पर हरकतों से लग रहे थे..अच्छा हुआ तुम ने बता दिया..नहीं तो आज तो उन्हें फोन करने ही वाली थी…

आदमी – किया तो नही ना माताजी..

माताजी – अभी तो नही किया..

आदमी – लाहौल विला कुव्वत, हम और चोर, या खुदा हमें उठाले

माताजी – उठाने से याद आया.. भैया ये सामान बिखरा पड़ा है इसको नेक अंदर कोठरियों में जमा दो..

आदमी( रेकी के इरादे से) – जी… माताजी अभी जमा देते हैं

इसके बाद तीनों ने ट्रंक, लोहे का सामान, बाट गेती फावड़े, और कबाड़ के आइटम जो सफाई के लिए चार दिन से बाहर बिखरे पडे थे सब जमा दिये..

इतने में एक कबाड़ी आ गया। बेकार लोहे के सामान के भाव तय हो गए। तब तक तीनों बुरी तरह थक कर उकडू बैठे रहे।

आदमी – माताजी हम जाएं।

माताजी – रुको.. इतना काम किया है… चाय पी कर जाना…

लड़के ( मुझे मान लो) जा चार जनों की चाय बना ला। और स्टील के कपन में लाईयो

आदमी – माताजी चाय हम बाजार में पी लेंगे

माताजी – शरीफ लोग हो इसलिए पिला रही हूँ कोई ऐसे वैसे होते तो फोन कर देती..

आदमी – बहुत शुक्रिया माताजी। चाय पीकर जायेंगे

माताजी – एक काम करो- जब तक चाय बने – लोहे का जो सामान अभी रखा है वापस निकाल दो.. कबाड़ी को बेचना है.. इसका भी त्यौहार मन जायेगा..

आदमी – आप बहुत दयालू हैं माताजी। अभी निकाल देते हैं..

फिर वही सामान बाहर आ गया। कबाड़ी को दिखाया। भाव पर बात नही बनी।

माताजी ( जीने में) – लड़के चाय नहीं बनी क्या?

लड़का – स्टोव अब स्टार्ट हुआ है ला रहा हूँ

माताजी – सुनो भैया… जा से तो बात बनेगी नही.. एक काम करो वापिस इसे अंदर रख दो..

तीनों ने एक दूसरे को संभाला। वापस रखने लगे। कोठरी में जाते ही गले लग कर रोते.. फिर आ जाते… कुल मिलाकर एक घंटा और लग गया।इतने में रामपाल जी आ गए..

रामपाल – भाभी जी, कबाड़ा बेच रया छ क
माताजी – हाँ पर इसकी लेने की मंशा दिख नही रही..

रामपाल जी ने भाव बिठा दिये..

रामपाल – ये तीनों कौन है.. तीन चार दिन से मोहल्ले में घूम रहे है.. मुझे तो गलत आदमी लग रह हैं। रामसरूप एसआई मेरा दोस्त कोतवाली में लग रहा है.. उन्ह बुलाऊँ क

आदमी – अरे यार चचा.. माताजी से पूछ लो शरीफ आदमी हैं.. सुबह से कुत्ते की तरह काम कर रहे हैं.. उफ्फ भी किया हो तो

माताजी – अरे नहीं रामपाल जी, तीनों शरीफ आदमी हैं। अच्छा सुनों, सामान वापिस निकाल लाओ। सौदा हो गया है

आदमी – जी माताजी

सामान वापस निकाला गया। कबाड़ी को दे दिया गया। एक आदमी तुलाने गया। दूसरा झाड़ू लगाने लगा। तीसरा अखबार की रद्दी बेचने प्रहलाद जी परचून की दुकान भेज दिया गया।

माताजी – रामपाल जी आपने ये तो बताया नही घी कैसा लगा। असली देसी घी भेजा था।

रामपाल – भाभी जी बहुत बढ़िया था। 15 दिन पहले एक बार सिर्फ मैंने ही खाया था। इतना ताकतवर था कि उसके बाद भूख लगना ही बंद हो गई। आज 15 दिन हो ग्या रोटी खाया। एक बात और छ भाभी जी..

माताजी – क्या बात है?

रामपाल – ऊ दिन से सपना म बिल्लियाँ खूब आ रही छ

माताजी – तो एक काम करो, अब मत खाना।

रामपाल – खायेंगे कैसे। उसी दिन जब घी गर्म कर रहे थे कि अचानक एक बिल्ली कूदी और पूरा घी गिराकर भाग गी।

माताजी – चलो अच्छा हुआ। वैसे एक बार डॉ. को भी दिखा लेना।

रामपाल – दिखा दिया था। आज ही रिपोर्ट आई है, लिखा है – भूख तो खुल जायेगी पर कितना ही खालो, जीवन भर कभी अंग नही लगेगा

इतने में तीनों शरीफ आदमी भी आ गए। चाय भी आ गई। स्टील के कपन में।

तीनों ने पहली सुड़की ही ली थी कि ” या अल्लाह.. अल्लाह खैर… ओ मेरे मालिक… की चीखें निकली। एक सेकिंड में तीनों के होठ सूज कर काले पड़ गए। बदहवासी छा गई और इसी आलम में चाय छोड़कर भाग गए।

स्टील के कपों की केफियत होती है की चाय 10-12 घंटो तक उसी टेंप्रेचर को मेंटेन रखती है जो स्टोव से उतारे जाने के वक़्त होता है।

रामपाल – अरे ये भाग क्यूँ गया

माताजी – शरीफ आदमी थे….

Waqt 24
Author: Waqt 24

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