
पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव पर पलटवार किया है। गहलोत ने कहा-
गहलोत ने कहा- भाजपा जनता को आंकड़ों में उलझाकर बरगलाने का प्रयास कर रही है। अरावली की 100 मीटर वाली नई परिभाषा को अकेले नहीं, बल्कि दो अन्य बड़े फैसलों के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए, जो यह साबित करते हैं कि यह पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि संस्थाओं पर कब्जा कर अरावली को खनन माफिया को देने की तैयारी है।गहलोत ने कहा- केंद्र सरकार ने 5 सितंबर 2023 को नोटिफिकेशन जारी कर 2002 में पर्यावरण संरक्षण के लिए बनी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) को सुनियोजित साजिश के तहत कमजोर कर उसे पर्यावरण मंत्रालय के अधीन कर दिया है।
वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित यह कमेटी अब सरकार के नोटिफिकेशन से स्थायी सरकारी कमेटी बन गई है। पहले CEC के सदस्य सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी से नियुक्त होते थे, लेकिन इस नोटिफिकेशन के बाद सदस्यों को चुनने का पूरा अधिकार केंद्र सरकार ने अपने हाथ में ले लिया जिससे CEC केन्द्र सरकार के इशारे पर काम करने लगी।
गहलोत ने कहा- यह वही CEC है, जिसकी निष्पक्ष रिपोर्ट के आधार पर 5 सितंबर 2011 को कर्नाटक की भाजपा सरकार के मंत्री जनार्दन रेड्डी को CBI ने अवैध खनन के मामले में गिरफ्तार किया था। ठीक 12 साल बाद 5 सितंबर 2023 को केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर पर्यावरण की रक्षा करने वाली उस सजग प्रहरी का गला घोंट दिया और उसे अपनी कठपुतली बना लिया।
आज CEC का काम केवल सरकारी फैसलों पर मुहर लगाना रह गया है। क्या सरकार को डर था कि अगर CEC स्वतंत्र रही तो अरावली और सरिस्का जैसे संरक्षित क्षेत्रों में खनन की अनुमति नहीं मिलेगी?
गहलोत ने कहा- केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव का यह दावा कि इस नए फैसले के बाद भी अरावली के केवल 0.19% हिस्से पर ही नई माइनिंग हो सकती है, क्योंकि बाकी जगह टाइगर सेंचुरी, प्रोटेक्टेड एरिया आदि हैं, अपूर्ण है। संरक्षित क्षेत्र में खनन के प्रयास की सरकार की मंशा का सबसे बड़ा उदाहरण सरिस्का के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) में बदलाव का प्रयास है।

