टोंक
‘‘रात की चुप्पी में टूटी सांसों की डोर, खेतों का रखवाला हो गया सदा के लिए मौन। सत्तर बरस का श्रम, माथे पर ईमान, चार अजनबी आए और छीन लिए उसके प्राण।’’ यह मार्मिक और सख्त टिप्पणी विशिष्ट न्यायाधीश (एससी-एसटी कोर्ट) आरती माहेश्वरी ने मंगलवार को अपना फैसला सुनाते हुए की। न्यायालय ने 10 साल पुराने अलीगढ़ थाना क्षेत्र के कासिमपुरा हत्याकांड में तीन अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।
प्रकरण के अनुसार, 18 फरवरी 2016 को कासिमपुरा निवासी 70 वर्षीय किसान बद्रीलाल अपने खेत पर रखवाली करने गए थे। वहां गिर्राज, हरजी, सरदार उर्फ कालू और उनके चौथे साथी श्रवण (मृत्यु हो चुकी) ने लूट की नीयत से उन पर हमला कर दिया। आरोपियों ने बद्रीलाल के गले में रुमाल का फंदा डालकर उनकी बेरहमी से हत्या कर दी और उनके कानों में पहनी सोने की मुर्कियां लूटकर फरार हो गए। सुबह जब छोटा बेटा प्रेमराज खेत पर पहुंचा, तो पिता का शव चारपाई के नीचे पड़ा मिला।
अपराध विशिष्ट लोक अभियोजक मेघराज जाट ने बताया कि अभियोजन पक्ष ने आरोपियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए कोर्ट में 17 गवाह, 55 दस्तावेज और 7 आर्टिकल्स पेश किए। लंबी बहस और साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने तीनों अभियुक्तों (गिर्राज, हरजी और सरदार) को हत्या व लूट का दोषी माना। न्यायाधीश ने अभियुक्तों को हत्या की धारा में आजीवन कारावास व 50 हजार रुपए जुर्माना और लूट की धारा में 10 साल के कठोर कारावास व 25 हजार रुपए के अर्थदंड से दंडित किया है। यानी प्रत्येक दोषी को कुल 75-75 हजार रुपए का जुर्माना देना होगा। कोर्ट ने मृतक के पुत्र रामकेश को पीड़ित प्रतिकर स्कीम के तहत आर्थिक सहायता दिलाने की अनुशंसा भी की है। उन्होंने बताया कि न्यायालय का यह फैसला समाज के लिए नजीर है। 10 साल के लंबे इंतजार के बाद पीड़ित परिवार को न्याय मिला है। चौथे आरोपी श्रवण की मौत हो जाने के कारण उसके खिलाफ कार्रवाई अबेट (समाप्त) कर दी गई थी, लेकिन जीवित बचे तीनों दोषियों को उनके कर्मों की सजा मिल गई है।
जज आरती माहेश्वरी ने अपने फैसले में कविता के जरिए समाज और अपराधियों को कड़ा संदेश दिया। उन्होंने लिखा- “दुपट्टे की गांठ में घुटती रही पुकार, लालच की आंधी में मर गया इंसानियत का विचार। कानों की मुर्कियां बनी मौत का कारण, सोने की भूख ने कुचल दिया मानव धर्म। न्याय की धरती पर प्रश्न आज खड़ा हुआ, क्या इतना सस्ता है किसी का जीवन?” जज ने अपने उद्गारों में स्पष्ट किया कि ऐसे जघन्य अपराधों पर किसी भी तरह का लिहाज नहीं किया जा सकता।

