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आंशिक फैसला वापस मगर विपक्ष को पूर्ण फैसला वापसी तक लड़ना होगा:शकील अख़्तर

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हम थोड़ा संभल कर कह रहे हैं कि गलत काम करने वाले डरपोक होते हैं। तेजस्वी यादव ने तो अभी सीधे कायर कह दिया। और असर दिखने लगा है।
तेजस्वी ने कहा तो मीडिया को है। बहुत ही सख्त भाषा में देश और बिहार को बर्बाद कर दिया। बिके हुए लोग हैं। बेशर्म। चुनौती दी कि अख़बार लाओ। दिखाओ कितनी जगह विपक्ष को दी है कितनी भाजपा को। बायकाट की चेतावनी दी। क्या नहीं कहा। सब कह दिया। यह भी कि देश को बर्बाद करने में सबसे बड़ी भूमिका मीडिया की है। और मैं तुम्हारे एडीटर फेडिटर किसी से नहीं डरता।
नेता के कहने का असर होता है। और उसका तो बहुत ज्यादा जिसके पास बड़ी तादाद में मजबूत समर्थक हों। तेजस्वी ने कहा कि हम अपने समर्थकों से कह देंगे। गांव में अख़बार नहीं घूस पाएगा। सही बात है। मुलायम सिहं यादव ने यूपी में किया था। हल्ला बोल के नाम से। जिस अख़बार के खिलाफ किया था उसे माफी मांगना पड़ी थी।
तो असर मीडिया में तो इतनी जल्दी दिखेगा नहीं। क्योंकि विपक्ष की ही कुछ बड़ी पार्टियों के नेता उन्हें पुचकारते रहते हैं। अपने स्वार्थ से कि हमारा चेहरा दिखाते रहो। बाकी देश के बर्बाद करना या हमारी पार्टी के नेता को ही बदनाम करना जो भी करना है करते रहो।
अभी राहुल गांधी के खिलाफ बीजेपी ने एक गंदा अभियान चलाया। बिहार से ही संबंधित है। महिलाओं को बांटे जाने वाले सेनेटरी पेड पर राहुल का फोटो चिपका कर राहुल के बारे में अनाप शनाप लिखा गया। पूरी तरह फर्जी फोटो था मगर कांग्रेस द्वारा समय पर काउंटर नहीं करने से उसी तरह लोगों ने यकीन कर लिया जैसे इस बात पर कर लिया था कि राहुल ने आलु से सोना बनाने की बात कही है।
खुद कांग्रेस के लोगों ने कहा था कि देखिए राहुल कैसी बात कर रहे हैं। उस समय के मीडिया संभालने वालों ने कोई प्रतिकार नहीं किया कि वीडियो फर्जी है। बाद में उसे बनाने वाली ऐजेंसी ने भी माना कि उसे पैसे देकर यह फर्जी वीडियो बनवाया गया था। मगर कांग्रेस ने उस वीडियो के खंडन में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। वैसे ही आज भी सोशल मीडिया के दूसरे एक्टीविस्टों ने इस सेनेटरी पेड वाली खबर की झूठ का पर्दाफाश करने की कोशिश की। मगर बीजेपी की आई टी सेल की बड़ी ताकत के सामने छुट पुट कोशिशें कितनी कामयाब हो सकती हैं?
जैसा अभी तेजस्वी ने किया वैसे ही राहुल भी मीडिया को आईना दिखाते रहते हैं। मगर फर्क यह है कि तेजस्वी की पार्टी का कोई आदमी अकेले में मीडिया से यह नहीं कह सकता कि अरे छोड़िए वह तो ऐसे ही कहते रहते हैं। कांग्रेस में तो बुला बुला कर मीडिया को राहुल के खिलाफ बताया जाता है। और पत्रकार कांग्रेस के बड़े पदाधिकारियों से कहते हैं कि आप राहुल को क्यों नहीं समझाते?
कांग्रेस में राहुल का यह संघर्ष बड़ा है कि वह अपनी पार्टी के होस्टाइल ( राहुल की नीचा दिखाने वाले) नेताओं के बीच रहकर इतने शांत और संयत बने रहते हैं। कांग्रेस के नेताओं की मजबूरी है कि बिना राहुल के पार्टी एक रह नहीं सकती। नहीं तो वे राहुल को ही यह आरोप लगाकर पार्टी के बाहर कर सकते हैं कि यह आदमी मीडिया की बहुत आलोचना करता है। मीडिया उनके लिए सगी हो जाएगी और राहुल सौतेले!
खैर बात तेजस्वी की थी। उन्होंने मीडिया को जिस तरह टाइट किया उसका असर चुनाव आयोग पर भी दिखा।
हमने पहले ही कहा था डीबी लाइव पर बात करते हुए भी और अखबारों में लिखते हुए भी कि चुनाव आयोग को यह असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक फैसला वापस लेना पड़ेगा। एक महीने में आठ करोड़ लोगों के वोटों की जांच संभव ही नहीं है। और मूल सवाल विधानसभा चुनाव के तीन महीने पहले ही क्यों याद आया आपको? पत्रकार इसको नहीं लिख रहे कि बरसात में बिहार की सबसे बड़ी खबर बाढ़ ही हुआ करती है। कौन सा अख़बार, टी वी चैनल है जो हर साल बिहार की बाढ़ की भयावह खबरें नहीं छापता नहीं दिखाता? जहाज से सहायता पहुंचाना बाढ़ से घिरे पानी में पेड़ के उपर चढ़े आदमी और साथ में सांप तक दिखाना। मगर अब कोई नहीं लिख रहा कि बरसात के मौसम में यह विशेष गहन पुनरीक्षण ( एसआईआर) कैसे होगा?
बहरहाल तेजस्वी का रौद्र रूप देखकर मीडिया तो सहमा ही चुनाव आयोग भी घबरा गया। पटना में जब तेजस्वी बिहार चुनाव आयुक्त से मिलने गए तो समर्थकों की भारी भीड़ उनके साथ थी। नारे लगाती हुई उस भीड़ का आक्रोश देखकर कोई भी समझ सकता था कि लोग किस मूड में हैं।
तेजस्वी से मुलाकात के अगले दिन ही शनिवार को चुनाव आयोग को कहना पड़ा कि बीएलओ द्वारा बांटे गए फार्म के साथ कोई दस्तावेज जरूरी नहीं हैं। केवल साइन करके वैसे ही फार्म जमा करा दें। इससे पहले पासपोर्ट जैसे डाक्यूमेंट मांगे गए थे। और आधार को अमान्य कर दिया था।
यह फैसला वापस लेने की शुरूआत है। 9 जुलाई बुधवार को विपक्षी दलों ने बिहार बंद का आव्हान किया है। जैसा माहौल है उसे देखते हुए बंद अभूतपूर्व होगा। मीडिया, चुनाव आयोग और भाजपा सब समझ रहे हैं। और यह भी कि अगर ऐतिहासिक बंद हो गया तो महागठबंधन को चुनाव डिक्लेयर होने से पहले ही निर्णायक बढ़त मिल जाएगी।
जनता फैसला करती है मुख्यमंत्री का चेहरा कौन? तेजस्वी के इस समय के फार्म के सामने नीतीश कुमार का थका मांदा चेहरा नहीं चलेगा। और भाजपा में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह अपना कोई चेहरा अभी से सामने ला सके। अगर भाजपा ने ऐसा किया तो नीतीश का समर्थक एकदम से उससे टूट जाएगा। और बिना नीतीश के जनाधार के भाजपा के लिए महागठबंधन से लड़ना बहुत मुश्किल है।
भाजपा और चुनाव आयोग ने यह गहन पुनरीक्षण उन वोटों को छांटने के लिए किया था जो गरीब कमजोर हैं, दलित महादलित, पिछड़े महापिछड़े हैं, काम करने के लिए बिहार के बाहर गए हुए हैं। आमतौर पर लोग समझ रहे थे कि यह मुस्लिम वोट काटने के लिए है। मगर बिहार की जैसी राजनीति है वहां सत्ता पक्ष ही मुस्लिम वोट काटने नहीं देगा। नीतीश के 20 साल मुख्यमंत्री बने रहने में मुस्लिम वोटों का बड़ा हाथ है। सत्ता पक्ष की दूसरे बड़े नेता चिराग पासवान को भी मुस्लिम वोटों का सहारा है। इसके अलावा जीतनराम मांझी की पार्टी, उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी को भी मुस्लिम वोट मिलता है। इसलिए तलवार वहां मुस्लिम पर कम और उन दलित पिछड़े समुदायों पर ज्यादा लटकी है जो भाजपा के मनुवाद और जिसे अभी तेजस्वी ने कहा सामंतवाद के कारण उससे दूर रहते हैं।
भाजपा फंस गई है। पहलगाम के आतंकवादी हमले फिर अचानक सीज फायर और उसके बाद सेना द्वारा लगातार यह बताए जाने कि किस तरह भारत अकेला पड़ गया था मोदी का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है। उनकी बातें बेअसर होने लगी हैं। विदेश नीति की असफलता सबको दिखने लगी है।
ऐसे में बिहार चुनाव मोदी के लिए बड़ी परीक्षा है। उसी के लिए यह गहन परीक्षण की स्कीम लाई गई थी। मगर अब यह उलटी पड़ गई है।
चुनाव आयोग भारी दबाव में है। देखना है कब तक वह अपने फैसले पर कायम रह पाता है। आंशिक शुरूआत तो हो गई है फैसला वापस लेने की। लेकिन विपक्ष को पूर्ण फैसला वापसी से पहले अपने तेवर ढीले नहीं करना चाहिए। तभी उसे इसका फायदा विधानसभा चुनाव में मिल पाएगा।

Waqt 24
Author: Waqt 24

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